Tuesday, 27 September 2016

                                            जीवन है पानी की बूँद , कब मिट जाये रे ।
स्पष्ट है कि ये जीवन बहुत ही अनमोल है इसलिए आप जो कुछ भी कर रहे हो सोच-समझकर ही करें। होश में जिए आजकल अधिकांश लोग बेहोशी नशे में जी रहें है ,और इसी क्षणिक आनंद को ही सबकुछ समझकर मग्न है  और अपने वास्तविक स्वरूप को भूलते जा रहें है कितने दुख का विषय है । हम सभी इन्द्रियों के वश में होकर दिनचर्या के सभी कार्य इन्द्रियों को संन्तुष्ट करने के लिए इस नश्वर संसार में भटक रहे है पागल हुए जा रहे है ठीक उसी कस्तूरी मृग की तरह जो कस्तूरी की खुशबू से प्रभावित होकर उसको पाने के लिए जंगल में दर-दर भटकता है लेकिन अंत में उसे निराशा ही हाथ लगती जबकि कस्तूरी मृग स्वंय के अंदर ही होती है ।
ठीक इसी प्रकार मनुष्य के इन्द्रियों की समस्,  सन्तुष्टि उसके अंदर  ही मौजूद है , इसके लिए उसे अपनी आँखों से अपने अंदर ही देखना पड़ेगा , अपने कानों अपने अंदर की आवाज को सुनना पड़ेगा , अपनी जीभ से अपने ही अर्थात् परमात्मा के स्वाद को जानना पड़ेगा  , अपने आप को स्पर्श करके महसूस कीजिए, अपने अंदर की खुशबू को महसूस करों , इन सभी को मिलाकर आत्मा, परमात्मता  और महात्मा का अनुभव हो सकता है।

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